Sat. Feb 16th, 2019

देश के मेरे वाले भाग में बहुत से बुद्धिमान लोग थे।’ जावेद खान ने कहा, ‘वे, जो कानून बनाते थे, काजी के रूप में जाने जाते थे और हम उनका पालन करते थे; क्योंकि वे उचित होते थे। हमारे बचपन से ही हमें बुद्धिमान काजियों द्वारा जारी किए गए आदेशों के प्रति आज्ञाकारी होना सिखाया जाता था।’

कमल ने पूछा, ‘और अवज्ञा, जावेद खान?’

‘यह एक बुरा शब्द है और शायद ही कभी इसका प्रयोग करने की जरूरत होती है।’

मौसम साफ हो चुका था और कमल स्कूल से घर जाते समय रास्ते में कश्मीरी दुकान पर रुका था। 8,000 फीट ऊपर ऊँचाई पर बर्फ दिखाई दे रही थी; लेकिन उससे नीची ऊँचाइयों पर बर्फ तेजी से पिघल रही थी।

‘आज शाम भी क्या आप कहानी सुनाने जा रहे हैं, जावेद खान?’ कमल ने पूछा।

‘मुझे पता नहीं, हुजूर। यह संभव है कि हमारे नन्हे मित्र आज शाम को नहीं आएँ। ऐसे मौसम में वे सारे दिन खेलते रहेंगे और शाम तक वे इतने ज्यादा थक जाएँगे कि मेरी दुकान तक चलकर न आ सकें। क्या तुम आ रहे हो?’

‘शायद आप हमें अपने काजियों की बुद्धिमत्ता के बारे में किस्से सुना सकते हैं।’

‘ठीक है, अगर तुम लोग सूरज छिपने के बाद मेरी दुकान पर आना पसंद करोगे तो!’

‘मैं आऊँगा।’ कमल ने कहा, ‘आप पाँच बजे मुझे यहाँ देखेंगे।’

कमल पाबंदी से पाँच बजे जावेद खान की दुकान पर पहुँच गया और देखा कि काफी बच्चे उससे पहले ही वहाँ इकट्ठा हो चुके थे।

‘वे सब यहाँ हैं।’ जावेद खान ने खुशी से कहा, ‘उनके हाथ-पैर दुखने के बावजूद।’

शशि और विजय वहाँ थे, उसी तरह से शैतान लड़का अनिल और उसकी छोटी बहन नन्ही मधु, जिसके लंबे बाल उसके कंधों पर फैले हुए थे। बड़े संतोष के साथ अपने लंबे हुक्के से कश खींच रहे जावेद खान के सामने कमल फर्श पर बच्चों में शामिल हो गया।

शशि ने पूछा, ‘क्या हुक्के सोने के भी होते हैं?’

‘हाँ, हुक्के सोने और चाँदी के भी होते हैं; लेकिन मैं इसके जैसे साधारण हुक्के को ही पसंद करता हूँ।’

अनिल ने हँसी उड़ाते हुए कहा, ‘आखिरकार, आप एक साधारण आदमी ही तो हैं।’

जावेद खान को गुस्सा आ गया, ‘अगर ऐसा ही तुम सोचते हो तो तुम मुझसे यह कहानी नहीं सुनोगे।’

‘गुस्सा मत करो, जावेद खान।’ अनिल बोला, ‘यह तो बस, मजाक था।’

‘इतने छोटे होंठों से मजाक शोभा नहीं देता।’

अनिल थोड़ा झेंप गया; लेकिन जावेद खान ने उसके सिर को थपथपाया और कहा, ‘मैं तुम्हें एक बहुत ही विद्वान् काजी की कहानी सुनाऊँगा। उसकी बुद्धिमानी हमारे इलाके में एक लोकोक्ति बन गई थी और हमारे राजा ने उसे एक बड़े जिले का गवर्नर बना दिया था। उसके न्याय और बुद्धिमानी के माध्यम से इलाके के सबसे खूँखार लोग भी सबसे ज्यादा स्वामीभक्त बन गए थे।’

जावेद खान ने आगे कहा, ‘एक दिन राजा अपने दरबार में बैठा था और बुद्धिमान काजी उसके पीछे बैठा था। जब वे बात कर रहे थे, तभी एक कौआ उड़ता हुआ वहाँ आया और उसने जोरों से काँव-काँव की।’

‘काँव, काँव, काँव!’ कौआ करता रहा और हर कोई उसकी इस गुस्ताखी से अचंभित था।

राजा ने कहा, ‘इस पक्षी को यहाँ से निकालो।’ और तुरंत पक्षी को महल से बाहर निकाल दिया गया।

पाँच मिनट बाद फिर से कौआ उड़कर ‘काँव, काँव, काँव’ के साथ वहाँ आ गया।

क्रुद्ध राजा ने कौए को गोली मारने का आदेश दिया।

‘अभी नहीं, महाराज।’ बुद्धिमान काजी ने रोका, ‘शायद आपकी बाकी प्रजा की तरह से यह कौआ भी आपके सामने अपनी कोई फरियाद लेकर आया है।’

‘बहुत अच्छा, तो तुरंत इसकी जाँच की जानी चाहिए।’ राजा ने आदेश दिया और एक सिपाही को यह पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया कि कौआ क्या चाहता था।

जैसे ही सिपाही महल से निकला, कौआ भी उड़कर बाहर आया और सिपाही के आगे-आगे नीचे उड़ता हुआ उसे निकट ही लगे हुए एक चिनार के सुंदर पेड़ तक ले गया। वहाँ पहुँचकर कौआ एक घोंसले में जा बैठा, जो उस डाली पर टिका हुआ था, जिसे एक लकड़हारा काट रहा था। पूरे समय कौआ बहुत जोर से काँव-काँव करता रहा।

सिपाही तुरंत सारी स्थिति को समझ गया और उस आदमी को डाली काटने से रोकने का आदेश दिया। जैसे ही आदमी नीचे जमीन पर पहुँचा, कौए ने शोर मचाना बंद कर दिया।

‘क्या तुमने वह डाली काटनी शुरू करने से पहले उस पर पक्षी का घोंसला नहीं देखा था?’ सिपाही ने पूछा।

‘मेरे लिए एक पक्षी का घोंसला क्या है?’ आदमी ने बेअदबी से जवाब दिया, ‘शायद तुमसे थोड़ा सा अधिक कीमती।’

इस तरह से क्रोध दिलाए जाने पर सिपाही ने लकड़हारे को गिरफ्तार कर लिया और उसे राजा के पास ले गया तथा क्या हुआ था, उसकी सारी सूचना दी। राजा काजी की तरफ मुड़ा और पूछा, ‘इस आदमी को इसकी गुस्ताखी के लिए क्या दंड दिया जाना चाहिए?’

काजी ने जवाब दिया, ‘महाराज, कुत्ते कभी-कभी भौंकते हैं। अगर इस आदमी को पहले से पता होता कि सिपाही इस राज्य के आदेश का पालन कर रहा था और अपना खुद का हुक्म नहीं चला रहा था तो किसी भी प्रकार की गुस्ताखी नहीं होती। शायद यह आदमी पहले ही पछता रहा है। इसको दंड के रूप में कुछ बेंत लगाए जा सकते हैं।’

लकड़हारे के तलवों पर पाँच बेंत लगाए गए और उसे छोड़ दिया गया। हालाँकि दंड कठोर नहीं था, उसे अपने घर तक के पूरे रास्ते में उछल-उछलकर चलना पड़ा था।

अनिल और मधु की हँसी फूट पड़ी।

‘नहीं, उस पर हँसो मत।’ जावेद खान ने कहा, ‘तुम्हारी हँसी अगर वह सुन लेता तो यह दंड से भी अधिक होता। उस समय अगर उसने तुम्हें सुना होता तो उसके मन में कौओं के प्रति स्थायी नापसंदगी घर कर जाती, तब उसने सारे घोंसले उजाड़ दिए होते!’

‘सच है जावेद खान, सच है।’ कमल ने कहा।

‘अगर तुम में से कोई कभी काजी बनता है,’ वृद्ध व्यक्ति ने कहा, ‘किसी को कुछ पता नहीं होता है कि तुम एक दिन क्या बन सकते हो—अमीर और गरीब दोनों की फरियादों के साथ एक जैसा बरताव करो। सभी लोगों के साथ निष्पक्षता से व्यवहार करें, भले ही उनमें मेरी कहानी के कौए जैसे महत्त्वहीन व्यक्ति शामिल हों।’

‘सच है जावेद खान, सच है।’ नन्हे विजय ने खुद को काजी जितना बुद्धिमान दिखाने के लिए कहा।

 
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Ruskin Bond

Author: Ruskin Bond

जन्म 19 मई, 1934 को हिमाचल प्रदेश के कसौली में हुआ था। बचपन में ही मलेरिया से इनके पिता की मृत्यु हो गई, तत्पश्‍चात् इनका पालन-पोषण शिमला, जामनगर, मसूरी, देहरादून तथा लंदन में हुआ। इनकी रचनाओं में हिमालय की गोद में बसे छोटे शहरों के जन-जीवन की छाप स्पष्‍ट है। इक्कीस वर्ष की आयु में ही इनका पहला उपन्यास ‘द रूम ऑन रूफ’ (The Room on Roof) प्रकाशित हुआ। इसमें इनके और इनके मित्र के देहरा में रहते हुए बिताए गए अनुभवों का लेखा-जोखा है। भारतीय लेखकों में बॉण्ड विशिष्‍ट स्थान रखते हैं। उपन्यास तथा बाल साहित्य की इनकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय हुई हैं। साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने 1999 में इन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।

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