Sat. Feb 16th, 2019

कोका कोला

केतली से निकला कोका कोला

सन् 1886 के दौरान की बात है। अमेरिका के न्यूयॉर्क हार्बर पर श्रमिक स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी को खाड़ी में स्थापित करने के महा-अभियान में लगे हुए थे और यहाँ से करीब 800 मील दूर जॉर्जिया की राजधानी अटलांटा में भी एक इतिहास रचा जा रहा था । यहाँ के एक फार्मासिस्ट डॉ. जॉन पेमबर्टान अपने घर के पिछवाड़े में एक ऐसा पेय पदार्थ बनाने में जुटे हुए थे, जो शरबत जैसा हो और सिरदर्द व दर्द-निरोधक औषधि के तौर पर काम आ सके। इसके लिए उन्होंने अपने अफ्रीकी नौकर में प्रचलित एक घरेलू नुस्खे को आधार बनाया। 8 मई, 1986 की एक दोपहर को पेमबर्टान ने नीबू, दालचीनी, कोका की पत्तियाँ और एक ब्राजीलियन झाड़ी के बीजों को पानी में मिलाया तथा उन्हें एक केतली में भरकर रख दिया। कुछ समय बाद इसे चखने पर पाया कि यह मिश्रण एक किस्म का शरबत बन गया था। इसमें कोका की महक और स्वाद के साथ नीबू व दालचीनी के गुण थे। डॉ. पेमबर्टान इस शरबत को परीक्षण के लिए पास ही स्थित जैकब्स फार्मेसी नाम की एक कंपनी में ले गए। वहाँ इसे कार्बोनेट पानी के साथ मिलाकर कुछ लोगों को पीने के लिए दिया गया। सभी ने इस नए स्वादवाले शरबत को पसंद किया। इस शरबत का कोका कोला नाम पेमबर्टान के दोस्त अकाउंटेंट फ्रैंक रॉबिंसन ने दिया।

The famous Coca-Cola logo was created by John Pemberton’s bookkeeper, Franck Mason Robinson. In 1885. Robinson came up with the name and chose the logo’s distinctive cursive script. The typeface used, known as Spencerian script, was developed in the mid 19th century and was the dominant form of formal handwriting in the United States during that period. Robinson also played a significant role in early Coca-Cola advertising..

मिश्रण एक किस्म का शरबत बन गया था। इसमें कोका की महक और स्वाद के साथ नीबू व दालचीनी के गुण थे। डॉ. पेमबर्टान इस शरबत को परीक्षण के लिए पास ही स्थित जैकब्स फार्मेसी नाम की एक कंपनी में ले गए। वहाँ इसे कार्बोनेट पानी के साथ मिलाकर कुछ लोगों को पीने के लिए दिया गया। सभी ने इस नए स्वादवाले शरबत को पसंद किया। इस शरबत का कोका कोला नाम पेमबर्टान के दोस्त अकाउंटेंट फ्रैंक रॉबिंसन ने दिया।

सफल वैज्ञानिक की असफल कंपनी

पेमबर्टान ने एड हॉलैंड नाम के एक दोस्त के साथ कोका कोला कंपनी बनाकर जैकब्स फार्मेसी के साथ एक अनुबंध किया और 5 सेंट प्रति गिलास की दर से कोका कोला को बेचने का निर्णय लिया। पेमबर्टान ने इस शरबत के प्रचार पर कुल 80 डॉलर खर्च किए। वे पहले साल में मात्र 50 डॉलर ही मुनाफा भी कमा सके, क्योंकि वे प्रतिदिन मात्र नौ गिलास कोला ही बेच पाए। कहा जाता है कि पेमबर्टान को कोकीन की लत थी और इस कारण वे बीमार व दिवालिया हो गए थे। मजबूरन वर्ष 1892 में उन्होंने कोका कोला को असा कैंडलर नामक एक अन्य कारोबारी को मात्र 2,300 डॉलर में बेच दिया। दिलचस्प बात है कि आज कोका कोला 142 अरब डॉलर से ज्यादा पूँजीवाली कंपनी है। 200 से ज्यादा देशों में इसके 400 से ज्यादा ब्रांड हैं और रोजाना की बिक्री सवा अरब कैन-बोतलों की है। दुनिया भर में इसके विज्ञापन 500 से ज्यादा टी.वी. चैनलों पर दिखाई देते हैं ।

कैंडलर ने खरीदी, वुडरफ ने सँवारी

वर्ष 1893 में कैंडलर ने इस शरबत में भविष्य की संभावनाएँ देखते हुए इसके फॉर्मूले का पेटेंट करवा लिया। इसके बाद उन्होंने एक फैक्टरी लगाकर उत्पादन शुरू किया और जमकर विज्ञापन किया। उन्होंने अखबार और बिल बोर्ड्स के जरिए कोक को प्रचारित किया। अच्छा मुनाफा कमाने के बाद उन्होंने कंपनी को देश के मशहूर कोयला-स्टील उद्योगपति अर्नेस्ट वुडरफ को करीब ढाई करोड़ डॉलर में बेच दिया। 1923 में वुडरफ ने इस कंपनी को अपने बेटे रॉबर्ट को सौंप दिया, जो इसके वास्तविक उद्धारक बने। करीब 30 साल के अपने कार्यकाल में उन्होंने कंपनी को शून्य से शिखर पर पहुँचा दिया। उन्होंने प्रचार के लिए रेडियो और टी.वी. का सहारा लिया। रॉबर्ट वुडरफ के कार्यकाल में कंपनी ने प्रचार के लिए जो रीति-नीति अपनाई थी उस पर आज तक अमल हो रहा है। वुडरफ ने कोक की गुणवत्ता में सुधार कर उत्पादन बढ़ाया और कमाई का बड़ा हिस्सा विज्ञापन पर खर्च किया। उन्होंने वेंडिंग मशीनों, प्लास्टिक बोतलों और सोडा फाउंटेन के जरिए कोक की बिक्री को इतना बढ़ावा दिया कि वह बहुत जल्दी शराब और अन्य एनर्जी ड्रिंक्स का विकल्प बन गया। यही नहीं, शराब के साथ भी कोक की अच्छी जुगलबंदी बन गई। वुडरफ के बेहतरीन प्रबंधन और उपलब्धियों के कारण उन्हें कंपनी ने ‘द बॉस’ का संबोधन-सम्मान दिया। द बॉस ने 1954 में कंपनी प्रमुख पद छोड़ दिया, लेकिन वह जीवन भर कंपनी के निदेशक मंडल में बने रहे। वुडरफ का कार्यकाल कोका कोला कंपनी का स्वर्णिम युग कहा जाता है। वुडरफ को उनकी दयालुता और दानवीरता के लिए भी जाना जाता है।

हर पीनेवाले को कोक मिलना ही चाहिए

वुडरफ ने कोका कोला को एक ऐसे मुकाम पर पहुँचा दिया, जहाँ से वह विश्व विस्तार कर सकती थी। वुडरफ ने नया नारा दियाङ्तहर पीनेवाले को कोक मिलना ही चाहिए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आई शांति ने कोका कोला के विस्तार के साथ अन्य कंपनियों को ऐसे पेय उत्पादन का मौका दिया, जिनमें पेप्सिको प्रमुख कंपनी है। पेप्सिको की स्थापना कोका कोला के समानांतर हुई थी, लेकिन इसे पहचान बनाने में कई दशकों का वक्त लग गया। 80 के दशक तक दुनिया में कोका कोला का एकच्छत्र राज था, लेकिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मंदी के दौर के कारण इसकी लोकप्रियता घटने लगी। एक दौर ऐसा आया, जबकि वुडरफ की मौत के बाद कोका कोला की बाजार हिस्सेदारी मात्र 21 फीसदी रह गई। इसके बाद कंपनी ने पारंपरिक कोक के अलावा अन्य उत्पाद उतारे, क्योंकि बाजार में सॉफ्ट ड्रिंक सिंडीकेट्स बनने लगे थे। यहाँ कोका कोला ने अपनी बाजार-रणनीति को बदला और सिंगल प्रॉडक्ट के बजाय मल्टी-प्रॉडक्ट्स बुके बनाया। कंपनी ने कोका कोला के कई वेरिएंट्स लॉञ्च किए। इनमें डाइट कोक और कैफीन-फ्री कोक प्रमुख थी।

हमारे देश से मिला देश-निकाला 

’70 के दशक में कंपनी ने उन विकासशील देशों की ओर रुख किया जहाँ तेजी से लोग पश्चिमी जीवन-शैली अपना रहे थे। इनमें भारत भी एक था। बहुत जल्दी कोका कोला ने भारत में भी पैर जमा लिये और अपने मार्केट का नंबर ब्रांड बन गया। इसी दौरान भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैली और आपातकाल लगा। आपातकाल हटने पर जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई तो उसने कोका कोला को देश-निकाला दे दिया। करीब 16 साल का निर्वासन झेलने के बाद 1993 में कोका कोला ने भारत में वापसी की। यह उदारीकरण का दौर था, जिसका कोका कोला ने पूरा फायदा उठाया। भारत के स्थानीय सॉफ्ट ड्रिंक ब्रांड जैसेङ्तथम्स अप, लिम्का, माजा, सिट्रा, गोल्ड स्पॉट आदि को खरीदकर कोकाकोला ने पूरे बाजार पर एकाधिकार की रणनीति पर अमल किया। कंपनी ने ब्रांड बुके बनाया और सफलता पाई। 1993 से 2003 के बीच का समय कोका कोला इंडिया के लिए बड़ी चुनौतियों भरा था, क्योंकि कंपनी ने यहाँ करीब 1 अरब डॉलर का निवेश किया था। वह देश में टॉप विदेशी निवेशक बन गई थी । चुनौतियों ने कोका कोला को और मजबूती दी और उसने पूरे देश में अपने ब्रांड फैला दिए। इनमें डाइट कोक, स्प्राइट, फैंटा जैसे नए उत्पाद भी शामिल थे, जो पूरी दुनिया में धूम मचा रहे थे। कंपनी 25 से 30 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही थी और पेप्सी जैसी प्रतिद्वंद्वी को कड़ी टक्कर दे रही थी। इसी दौरान कोला ड्रिंक्स में कीटनाशक होने का मामला सामने आया। इसकी गूँज संसद् के कैंटीन से लेकर हर छोटे-बडे़ रेस्तराँ तक सुनाई दी। मामले ने तूल पकड़ा और जाँच समिति बनाई गई। भारतीय संसद् में माँग उठी कि कोक को फिर से देश-निकाला दे दिया जाए, लेकिन कुछ समय बाद सबकुछ सामान्य हो गया। कोक ने अपनी विश्वसनीयता सिद्ध कर दी। कोका कोला इंडिया का दावा है कि एक बोतल कोक बनाने की पूरी प्रक्रिया में करीब 400 छोटे-बडे़ प्रयोगशाला व अन्य परीक्षण किए जाते हैं। कंपनी भारत में करीब 10 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और लाखों छोटे-बड़े विक्रेताओं को रोजगार दे रही है। कोका कोला इंडिया के.सी.ई.ओ. और प्रेसीडेंट अतुल सिंह के नेतृत्व में कंपनी अपनी 122 साल पुरानी साख को और प्रतिष्ठित कर रही है।

कोका कोला के उत्पाद और बाजार

200 देशों में 400 से ज्यादा उत्पाद और करीब डेढ़ अरब बोतल प्रतिदिन का उत्पादन।

प्रमुख उत्पादङ्तकोका कोला, थम्स अप, फैंटा, लिम्का, स्प्राइट, माजा, किनले, जार्जिया, माइन्यूट, मैड, डाइट कोक, चेरी कोक, कोक विद लाइम, कोका कोला जीरो, कोका कोला ऑरेंज, वनिला कोक, डाइट वनिला, डाइट विद लाइम, ब्लैक चेरी वनिला।

बाजारङ्त37 फीसदी अमेरिका में, 43 फीसदी चीन, जापान, ब्राजील, मेक्सिको में, 20 फीसदी बाकी दुनिया में।

Zip this !

’Automatic Continuous clothing Clouser’ or the humble Zipper was invented by an American inventor and sewing machine pioneer Elias Howe in 1851. Nearly 44 years later, Jusdon Whitcomb marketed it as the ’Clasp Locker’. Today, he is recognised as the inventor of the Zipper.

A big idea isn’t any good till you put it at work, is it ? THINK PRACTICAL!

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं। ‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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